देवगढ़ किला गोंडवाना कि धरोहर ……

मध्यप्रदेश के जिला छिंदवाड़ा कि मोहखेड़ में देवगढ़ स्थित है……

कमाल है देवगढ़ …
किलें तक पहुंचने के लिए आपको थोड़ी ट्रैकिंग करनी पड़ती है। यह पर आपको करीब 1 से 2 किलोमीटर की ट्रैकिंग करनी पड़ती है।

देवगढ़ किलें तक पहुॅचने का रास्ता बहुत अच्छा है और किलें के रास्तें में दोनों तरफ आपको घने जंगल देखने मिल जाता है। यह किला चारों तरफ से खूबसूरत पहाड़ियों और गहरी खाई से घिरा हुआ है। यह किला पहाडी के शिखर पर स्थित है। यह किला सुरक्षा की दृष्टि से बहुत ही मजबूती से बनाया गया था। इस किलें में आक्रमण करना असंभव था। आप उत्तर दिशा से किलें में प्रवेश कर सकते हैं।


देवगढ़ का किला 18वीं शताब्दी में बनाया गया था। यह किला गोंड वंश के राजाओं की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध था। कहा जाता है कि इस किले का निर्माण प्रतापी राजा जाटाव के द्वारा हुआ था। यह किला एक पहाड़ी पर बनाया गया है। किलें में देवगढ के राजा धुरवा की राजाओं की समाधि है। अगर आप इतिहास के बारे में जानने के शौकीन है, तो आपको यहां पर एक बार जरूर आना चहिए। किलें की बनावट काफी हद तक मुगल वास्तुकला से संबंधित है। किलें में आपके देखने के लिए मोती टांका, बादल महल, कचहरी, और नक्कारखाना है। इस जगह की खूबसूरती आप इस किलें में जाकर आप देख सकते हैं। आइए इस जगहों के बारे में मैं आपको शब्दों के द्वारा बताने की कोशिश करती हूं।

नक्कारखाना
नक्कारखाना की छत पर सिपाई तैनात होतें थे, जो किले के अंदर चारों ओर की चौकसी करतें थे। नक्कारखाना में राजा के आगमन की सूचना आम लोग को नगाड़ा बजा कर दी जाती थी। नक्कारखाना की बाहरी दीवारों को सुंदर अलंकारों से सजाया गया है, जो इसकी शोभा को बढाता था। जिसके अवशेष आज भी विद्यमान है। नक्कारखाना में वादक मौजूद होते थे, जो राजा के आगमन पर मधुर ध्वनि बजाकर अभिनंदन करते थे।

कचहरी
कचहरी में राजा का दरबार लगाया जाता था। यहां पर मंच पर राजा और दरबारी बैठा करते थे। जनता मंच के सामने खड़ी होती थी। मंच की छत लकड़ी के सुंदर स्तंभों पर आधारित थी। राजा के बैठने के लिए मंच पर गद्दी बनी है, जो उस समय सुंदर रत्नों सुसज्जित थी। कचहरी में लोग राजा की अनुमति के अनुसार ही प्रवेश करते थे। यहां राजा की सुरक्षा हेतु कचहरी में उपस्थित आम लोगों पर नजर रखा जाती थी।

हमाम
स्थानीय लोग इस कक्ष को हमाम कहते थे। इस कक्ष को राजा रानी के मनोरंजन के लिए निर्मित किया गया था। इस कक्ष का विन्यास आयताकार है। इसके मध्य में स्थित फव्वारा इस कक्ष की शोभा बढ़ाता है। इस कक्ष की दीवारों पर रोशनी के ओले निर्मित किए गए थे।

प्राचीन चंडी मंदिर
देवगढ़ के किलें के एक बुर्ज में एक मंदिर स्थित है। जिसे स्थानीय लोग चंडी मंदिर कहते हैं। इस किलें रक्षा के उद्देश्य की मजबूत दीवारों को जोड़ते हुए 11 बुर्ज बनाए गए थे। यह पर शत्रु पर निगरानी रखने के लिए कुछ किलोमीटर की दूरी पर अलग अलग चैकियां बनाई गई थी।

मस्जिद
देवगढ़ के किलें में आपको एक मस्जिद भी देखने मिल जाती है। राजा जाटव की मृत्यु के पश्चात उनके प्रापोत्र महराज कोकवा द्वितीय के पुत्रों में देवगढ़ के शासक बनने के लिए झगड़ा शुरू हो गया। जिसके फलस्वरूप उनके पुत्र बख्त गद्दी पाने के लिए मुगल सम्राट औरंगजेब की सहायता लेकर देवगढ़ का राज्य प्राप्त किया। इस सहायता के बदले उसने इस्लाम धर्म अपना लिया और बख्त बुलंद शाह की उपाधि धारण की। पर इसी अवसर पर यहां पर मस्जिद का निर्माण किया गया था।

मोती टांका
देवगढ़ के किलें में आपको एक तालाब भी देखने मिलता है। जिसे मोती टांका भी कहा जाता है। इस किलें में पानी की सुचारू व्यवस्था थी। यह पर पानी को एकत्र करने के लिए बहुत सारे तालाब और कुए बनाये गए थे। इन तालाबों में मोती टांका फैमस है।

आप जब देवगढ़ का किला देखने जाएगें। तब आपको यह सभी जानकारी मिलेगी। आप इस किलें में अपनी फैमिली के साथ जा सकते है। यह पर आप बहुत इजांय कर सकते है। आप सर्दियों में या बरसात के मौसम में इस जगह की यात्रा कर सकते हैं। आप इस जगह पर जाते है, तो अपने लिए खाना और पानी लेकर जायें। क्योकि यह पर किसी भी तरह की कोई भी सुविधा नहीं है। यह पिकनिक के लिए अच्छी जगह है। यह जगह बहुत कम लोगों को पता है, इसलिए यहां पर बहुत कम लोग आते हैं। पहाड़ी के ऊपर से दृश्य काफी मनोरम है।

 

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